Sunday, 25 March 2018

न्यूटन Newton - यथार्थ का बेजोड़ आख्यान

Newton - यथार्थ का बेजोड़ आख्यान
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नू का 'न्यू', तन का 'टन' करने वाले नूतन कुमार उर्फ़ न्यूटन के दिलचस्प और बेलौस चरित्र पर केंद्रित यह फ़िल्म भारतीय सिनेमा की कुछ यादगार और प्रभावी फ़िल्मों में से एक रहेगी।

आदर्शवाद के यूटोपिया में जीने वाला सीधा-सादा युवक न्यूटन अपने रिश्ते के लिए कम उम्र की लड़की लेकर आए परिजनों को सिरे से इंकार करने से लेकर, ऑफ़िस में प्राइवेट बात के लिए 'लंच ब्रेक' का इंतज़ार करने तक, घनघोर ईमानदारी का पुलिंदा है।
इसीलिए न्यूटन को हर कोई नसीहत दे ही जाता है जीवन में थोड़ा 'प्रैक्टिकल' होने की-
'तुम्हारी दिक़्क़त क्या है?'
'ईमानदारी का घमंड'



भारतीय लोकतंत्र के महापर्व 'चुनाव' के इर्द-गिर्द रचे गए इस आख्यान में अपनी तथाकथित अव्यावहारिकता ( impracticality) के बावजूद न्यूटन हमारी सोच और व्यवस्था पर कुछ बड़े और प्रासंगिक सवाल उठाता है:-

-आख़िर क्या कारण है कि हमारे पीठासीन अधिकारी अक्सर दुर्गम और सुदूर जनजातीय क्षेत्रों में चुनाव ड्यूटी से बचने के लिए हर सम्भव पैंतरा (बीमारी के बहानों समेत) आज़माते हैं।

- क्यों यह समझना ज़रूरी है कि एक परिपक्व लोकतंत्र में एक-एक वोट का कितना महत्व है, भले ही मतदाता अशिक्षित और ग़ैर-जागरूक ही क्यों न हो।

-"इलेक्शन बूथ' में ताश खेलने की पुरानी परम्परा है", यह संवाद हमारी 'ग़लत प्रवृत्ति को justify करने की आदत का बेहतरीन नमूना' नहीं है?

-असिस्टेंट कमाडेंट साहब ('आत्मा सिंह'- पंकज त्रिपाठी) का यह कहना कि -'लोकल लोगों पर विश्वास नहीं है', हमारे ही समाज के भीतर परस्पर अविश्वास के संकट की ओर संकेत करता है। स्थानीय जनजातीय समुदाय की बूथ लेवल अधिकारी (BLO) को चुनाव प्रक्रिया से दूर रखने का प्रयास किस सोच की ओर इशारा करता है?

-"वर्दी में जिसे चाहे धमका रहे हैं।"
"वर्दी  में विनती भी धमकी लगती है।"
जैसे संवाद हमारे सुरक्षा बलों के प्रति समाज में सम्वेदनशीलता की ज़रूरत की ओर ध्यान खींचते हैं।

- निर्वाचन प्रक्रिया कितनी महत्वपूर्ण है और polling manual एक पीठासीन अधिकारी (presiding officer) को कितनी असीम शक्तियाँ देता है, यह इस मूवी में समझा जा सकता है।

- 'पिकनिक नहीं ये duty है मेरी', हममें से कितने हैं, जो इस स्तर का कर्तव्यबोध रखते हैं?

- भारतीय भाषाओं और बोलियों के प्रश्न की ओर भी यह मूवी ध्यान आकर्षित करती है। जहाँ एक ओर हमारा संविधान और दुनिया भर के मनोविज्ञानी मातृभाषा में प्रारम्भिक शिक्षा की वकालत करते हैं, वहीं गाँव-क़स्बों-शहरों में चारों ओर हर वर्ग के लोग कुकुरमुत्तों की तरह गली-गली उगे हुए 'पब्लिक स्कूलों' में तथाकथित इंग्लिश मीडियम स्कूलों (ज़्यादातर गुणवत्ता से कोसों दूर) में पढ़ाई कराकर अघा रहे हैं।
फ़िल्म का एक संवाद 'आजकल कुत्ते भी इंग्लिश समझते हैं', हालात की गम्भीरता बयाँ करने को काफ़ी है।
वैसे गोण्डी भाषा के माध्यम से जनजातियों की भाषा का गम्भीर प्रश्न भी उठाया गया है।

- तमाम सवालों के बीच ये कहानी नियमों के अनुरूप आचरण करते वक़्त 'application of mind' की ज़रूरत पर भी ध्यान खिंचती है। दिमाग़ का समुचित इस्तेमाल किए बग़ैर कोई भी 'रूल बुक' या मैनुअल सिर्फ़ एक काग़ज़ का पुलिंदा भर है।

-'ईमानदारी के अवार्ड में सबसे ज़्यादा बेईमानी होती है।',जैसे संवाद हमारी व्यवस्था पर दिलचस्प ढंग से व्यंग्य करते हैं।
राजकुमार राव और पंकज त्रिपाठी ने अपने देसीपन से भरे अभिनय से बेहद प्रभावित किया है। हिंदी सिनेमा के अच्छे दिन आ रहे हैं।

हिचकी Hichki : ‘क्यों’ और ‘क्यों नहीं’ में हिचकी भर का फ़र्क़ है...

हिचकी: ‘क्यों’ और ‘क्यों नहीं’ में हिचकी भर का फ़र्क़ है...
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लम्बे वक़्त बाद कोई फ़िल्म देखी। भावुक कर गयी यह फ़िल्म। बातों ही बातों में कब नैना (रानी मुखर्जी) ज़िंदगी का फ़लसफ़ा सिखा देतीं हैं, पता ही नहीं चलता।
किसी के शारीरिक या मानसिक विकार के कारण उस शख़्स को हिक़ारत की नज़र से देखने वालों के लिए नैना और उसके खान सर किसी मिसाल से कम नहीं।
* नैना कहती है- ‘अपने सच को अपनी कमज़ोरी नहीं, ताक़त बनाओ’।यही तो ‘विकलांग’ (disabled) से ‘विशेष योग्यजन’ (differently abled) तक की यात्रा है। दरअसल ख़ुद को अपनी सारी कमज़ोरियों के साथ स्वीकार करना जीवन में ख़ुशी हासिल करने के लिए बेहद ज़रूरी है।

* हर किसी differently abled व्यक्ति की हम सिर्फ़ एक ही तरीक़े से मदद कर सकते हैं कि उन्हें बाक़ी सामान्य लोगों की तरह treat किया जाए। उन्हें आपसे sympathy नहीं, empathy चाहिए।
* ’शिक्षा के अधिकार’ की मदद से elite कोन्वेंट स्कूल में प्रवेश पाने वाले ग़रीब बच्चों को स्वीकार न कर पाने की मानसिकता बेहद शर्मनाक है। वाडिया सर का बार-बार कहना ‘they don’t belong to us’ सोचने पर मज़बूर करता है। नैना ऐसे insecure लोगों को आईना दिखाने का काम बख़ूबी करती है। आख़िर ये कौन सी शिक्षा पद्धति है, जो मासूम बच्चों के कोमल मन में आर्थिक-सामाजिक आधार पर भेदभाव और घृणा की नींव रख रही है। सेक्शन 9 F से इतना भी क्या डरना?
* मुँह में सोने की चम्मच लेकर पैदा होने वाले और ‘बेस्ट’ स्कूलों में पढ़ने वाले luckier हो सकते है , पर ज़रूरी नहीं कि happier भी हों।
* फ़िल्म टीचिंग के noble profession में दुर्घटनावश आए reluctant teachers को भी आइना दिखाती है। नैना के ये तीन वाक्य किसी भी शिक्षक की ज़िंदगी का turning point बन सकता है-
1. There are no bad students, only bad teachers.
2. ग़लत सीखने के लिए हर स्टूडेंट के marks कट जाते हैं, पर ग़लत सिखाने पर teachers के मार्क्स नहीं कटते
3. ज़िंदगी स्कूल के बाहर जब इम्तिहान लेती है, तो subject-wise नहीं लेती।
* शिक्षक जैसे श्रेष्ठतम पेशे की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करती है नैना। हमें आज भी अपने फ़ेवरेट टीचर याद हैं, उनकी तनख्वाह नहीं। सचमुच वही टीचर बेस्ट हैं, जो टीचर होने के साथ-साथ नैना जैसे Friend, Philosopher and Guide हों। ऐसे टीचर को ताउम्र भुलाना नामुमकिन है।
-निशान्त जैन 

Monday, 28 August 2017

हम सबके प्रेमचंद ... Our Premchand

हम सबके प्रेमचंद ... Our Premchand
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Google
ने अपना doodle आज हिंदी-उर्दू के मशहूर लेखक-कथाकार मुंशी प्रेमचंद को समर्पित किया। जब भी प्रेमचंद का नाम मेरे ज़ेहन में आता है तो मैं यह सोचकर विषय से भर जाता हूँ कि एक इंसान को लोक जीवन के विविध पक्षों, परेशानियों और मन की भीतरी परतों की इतनी गहरी समझ कैसे हो सकती है। उस पर शिल्प का जादू देखिए, सीधी-सादी सरल भाषा और लोकप्रचलित मुहावरों कहावतों के प्रयोग से पढ़ने वाले के मन तक दस्तक दे सकने की कूवत प्रेमचंद के पास थी।


'पूस की रात', 'ईदगाह' 'पंच परमेश्वर' जैसी कालजयी कहानियाँ हों या, गोदान जैसा महाकाव्यात्मक उपन्यास; प्रेमचंद की कहानी कला और ग्रामीण जीवन पर ज़बरदस्त पकड़ का कोई और उदाहरण ढूँढना मुश्किल है।प्रेमचंद की शुरुआती रचनाएँ उर्दू में हैं तो बाद की हिन्दी में। कहा जाता है, कि ग्रामीण जीवन को समझना है तो प्रेमचंद के उपन्यासों का आस्वादन ज़रूरी है। आज भी किसान के दुःख-दर्द और विडंबनाओं के बीच उसके जीवट को समझने के लिए प्रेमचंद का साहित्य बेहद प्रामाणिक माना जाता है।
हमारे जैसी तमाम पीढ़ियों को ज़िंदगी की तमाम व्यावहारिक जटिलताओं और लोक जीवन के संघर्षमयी सौन्दर्य से रु--रु कराने वाले हम सबके प्रिय लेखक प्रेमचंद को उनके जन्मदिन पर नमन.....

Sunday, 27 August 2017

Toilet: एक प्रेम कथा : मामला शौच का नहीं, सोच का है ....

Toilet: एक प्रेम कथा : मामला शौच का नहीं, सोच का है
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भारत सरकार के महत्वाकांक्षी 'स्वच्छ भारत अभियान' के खुले में शौच मुक्त भारत के संदेश को ख़ुद में बेहतरीन तरीक़े से समेटने वाली यह मूवी एक बेहद दिलचस्प और शानदार मूवी है। अगर तक नहीं देखी है, तो देख आइए फटाफट। जानते हैं, क्यों?
एक देहाती अधेड़ युवक की भूमिका में केशव (अक्षय कुमार) और उनके छोटे पर नटखट भाई की भूमिका में दिव्येन्दु शर्मा ('प्यार का पंचनामा' में लिक्विड) की चुहल और छेड़छाड़ ने लगातार गुदगुदाने वाला हास्य पैदा किया है।
मथुरा में ब्रज की गलियों का देहाती माहौल और उसमें एक साइकिल स्टोर चलाने वाले नायक और टॉपर नायिका (भूमि पेडनेकर) के बीच पनपने वाला गँवई सहज प्रेम, साधारण निम्न मध्यमवर्गीय देसी जीवन और बोलचाल में ब्रज की मिठास, मूवी को बहुत दिलचस्प और मज़ेदार बनाते हैं। लट्ठमार होली और देसी बारात के दृश्य आम आदमी को ख़ुद को फ़िल्म से जोड़ पाने में मदद करते हैं।
फ़िल्म ने खुले में शौच की आदत से मजबूर समाज के हर दुराग्रह और कुतर्क पर जमकर चोट की है। सुबह-सुबह गाँव के बाहरी छोर के लिए घूँघट ओढ़े निकलने वाली महिलाओं की 'लोटा पार्टी' पर बेहद सपाट तंज कसने में फ़िल्म हिचक नहीं दिखाती-
'बहू से घूँघट कराओ और शौच के लिए खुले में भेजो'
'संडास करना इतनी बुरी चीज़ है तो पेट क्यों दिया भगवान ने?'
'बीबी साड़ी उठा के खुल्ले में बैठे, इसमें बड़ी शान है तुम्हारी?'
'जानवर को ही हक़ है इस घर के आँगन में हगने का'
'हम औरतें हैं, तो समझौता हमी को करना है।'
'देश के मर्दों को चौड़े में करने में मर्दानगी लागे?'
'सबसे बड़ा दोषी कौन? वे औरतें,जो कल सुबह फिर लोटा लेकर खुले में जाने वाली हैं'
इस तरह के संवाद बिना उपदेश दिए सहज ही सोच बदलने को मजबूर कर देते हैं।

घर और यहाँ तक कि गाँव की परिधि के भीतर भी शौचालय न बनने देने के पीछे दिए जाने वाले दकियानूसी और अजीब तर्कों की मूवी में अच्छे से खिंचाई की गयी है।
'शमशान क्यों ले जाते हो, मुर्दे को यहीं जला दो'
'अंग्रेज़ चले गए, क्या हम घर में टॉयलेट बनवाकर अंग्रेज़ी सभ्यता के ग़ुलाम बन जाएँ'
'टॉयलेट बनवाकर बीमारी घर ले आएँ क्या?'
'क्या राम-सीता ने जंगल में शौचालय बनवाए?'
खुले में शौच के पक्ष में दी जाने वाली संस्कृति और शास्त्रों की तथाकथित दुहाई की हल्के-फुल्के हँसी-मजाक द्वारा जमकर ख़बर ली गयी है। टॉयलेट के पक्ष में जंग छेड़ने वाले केशव (अक्षय कुमार) को यह समझने में देर नहीं लगती कि उसकी लड़ाई इसी 'सभ्यता' और 'संस्कृति' से है।
फ़िल्म के गाने, 'हंस मत पगली, प्यार हो जाएगा' और 'कर ले टॉयलेट का जुगाड़' आम आदमी के दिल से सीधे जुड़ जाते हैं। अनुपम खेर और सुधीर पाण्डेय ने दो एकदम विपरीत सोच के बुज़ुर्गों की भूमिका में बेहतरीन अभिनय से दिल जीता है।
मज़ाक़-मज़ाक़ में यह फ़िल्म दर्शकों की रुढ़िवादी सोच पर चोट करने में कामयाब हुई है। फ़िल्म का संदेश एकदम साफ है-
'परदा सोच से हटाके, शौच पे लगाने का वक़्त आ गया है।'
If you change nothing, nothing will change.

Wednesday, 16 August 2017

बॉब डिलेन (Bob Dylen), गीतों की दुनिया और साहित्य का नोबेल

मुझे लगता है कि जाने-माने अमेरिकी गीतकार और गायक Bob Dylan को लिटरेचर का नोबेल मिलना साहित्य जगत में एक नए बदलाव की आहट है। उम्मीद है, इससे हिन्दी और भारतीय भाषाओं का अकादमिक साहित्य जगत थोड़ा उदार होगा और लोकप्रिय साहित्य-संगीत को 'साहित्य' के रूप में स्वीकारना शुरू करेगा।

अकादमिक जगत के कुछ (सब नहीं, अतः कृपया दिल पर लें) मठाधीश टाइप के लोग लोकप्रिय गीतकारों और लोक कवियों को 'साहित्यकार' की श्रेणी में नहीं गिनते। हिन्दी साहित्य जगत में तो स्थिति और भी ख़राब है।ऐसी कविताजो एक सुशिक्षित व्यक्ति के भी पल्ले पड़े, सिर्फ़ उसे ही साहित्य मानने की जिद और आम बोल-चाल की भाषा में रचे गए लयबद्ध गीतों और कविताओं को दोयम दर्जे का साहित्य मानना कहाँ तक तर्कसंगत है, उम्मीद है, कुछ विद्वान ही इस पर प्रकाश डालेंगे। 
भूलना नहीं चाहिए कि साहित्य की तीन मूल विधाएँ -गीत, कहानी और नाटक, सभ्यता की शुरुआत से ही लोक-जीवन में रचे बसे हैं और अपनी लोक भाषा, लय और नाद सौंदर्य के बल पर आम जन की ज़ुबान पर चढ़ते रहे हैं। कबीर से लेकर निराला तक, कविता की तुकांतता ने निरंतर उसके नाद सौंदर्य के माध्यम से साहित्य को जन-जन तक पहुँचाया है।

हमें उम्मीद करनी चाहिए कि हिन्दी वाले अकादमिक लोग भी अब पुनर्विचार करते हुए गुलज़ार साहब, गोपालदास नीरज, दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी, प्रसून जोशी, इरशाद कामिल, स्वानन्द किरकिरे जैसे बेहतरीन गीतकारों के लोकप्रिय गीतों के लिटरेरी योगदान को कुछ तवज्जो देंगे।