Saturday, 31 December 2016

नए साल के नए संकल्प... (New Year Resolutions: my perspective)

नए साल के नए संकल्प...
New Year Resolutions....


जिस तरह हर नई सुबह पिछले दिन के तनावों और अवसादों से मुक्त एक नई शुरुआत की उम्मीद लेकर आती है, उसी तरह नया साल भी ख़ुद में नई ऊर्जा, नई उम्मीदों और नई आकांक्षाओं को समेटे हुए आता है। 
अख़बार-टी.वी.-सोशल मीडिया, सब ओर न्यू ईयर रिज़ोल्यूशन की बाढ़ आ जाती है। हम भी इसी उत्साह में कुछ पुरानी आदतों से छुटकारा पाने और नई आदतों को गले लगाने का संकल्प करते हैं, ताकि हम भी इस नए साल में किसी से पीछे न छूट जाएँ। साथ ही, ये संकल्प करते वक़्त ऐसा लगता है कि हम नए साल के पहले दिन से ही यकायक इन सारे नए संकल्पों का अक्षरश: पालन करना शुरू कर देंगे। यह उम्मीद तो होती है, कि नए साल में पुरानी पीड़ाओं और मुसीबतों से छुटकारा मिलेगा, और जीवन में सफलता व ख़ुशियों का नव उत्कर्ष भी होगा।
किसी कवि ने नए वर्ष पर बहुत ख़ूब लिखा भी-
"'सुखों की कल्पनाएँ हैं, सृजन के गीत लाए हैं,
तुम्हारे वास्ते मन में, बहुत शुभकामनाएँ हैं,
तुम्हारी ज़िन्दगी में कल न कोई पल घटे ऐसा,
उदासी में जो पल पिछले दिनों तुमने बिताए हैं।''

क्या कभी आपने यह भी सोचा है कि पिछले साल नववर्ष के अवसर पर आपने जो संकल्प (resolutions) लिए थे, उनकी प्रगति रिपोर्ट क्या है? मतलब उनमें से कितने संकल्प व्यवहार में परिणत हुए और कितने ठंडे बस्ते में चले गए। जिस तरह रेल बजट में हर साल नई-नई रेलगाड़ियों की घोषणा की ही तरह,  पिछले बजटों में घोषित रेलगाड़ियों का समयबद्ध संचालन भी ज़रूरी है; उसी तरह नए साल पर नए संकल्प संजोने के साथ-साथ पुराने सालों के पुराने से पड़ गए संकल्पों को व्यावहारिक धरातल पर उतरना भी। बशर्ते वे पुराने संकल्प अब भी काम के हों और प्रासंगिक भी हों।

चाहे आप पुराने संकल्प व्यवहार में उतार पाएँ या नहीं, पर फिर भी नया वर्ष नए संकल्पों का उत्साह साथ लाता ही है। लिहाज़ा नए साल में नए संकल्पों के बारे में सोचना बेहद स्वाभाविक भी है और आपकी जीवंतता का प्रतीक भी। मैं भी पिछले कई सालों से न्यू ईयर रेजोल्यूशन लेता रहा हूँ और इस बार भी लूँगा। अंतर बस इतना ही होता है, कि हर साल हमारी प्राथमिकतायें और ज़रूरतें बदलती जाती हैं।
आइए, बात करते हैं 10 ऐसे संकल्पों की, जो हर युवा अभ्यर्थी के लिए प्रेरक हो सकते हैं, और जिन्हें व्यवहार में उतारना ज़्यादा मुश्किल भी नहीं है:-
  1. जीवन में 'निरंतरता' को अपनाने की कोशिश करें। कोई अच्छा काम या अच्छी आदत शुरू करके उसे जारी रखना भी सीखें।
  2. हल्की सी मुस्कान हमेशा बनाए रखें। इससे आपको मुसीबत का सामना करने और नित आगे बढ़ते जाने में मदद मिलेगी। 'Never Never Never Give up'
  3. आज की ख़ुशी को आज ही enjoy करना सीखें। ख़ुशियों को कल पर न टालें। वर्तमान में जीने की आदत  डालें, अतीत से सीखते रहें और भविष्य की दिशा में क़दम बढ़ाते जाएँ।
  4. छोटे-छोटे लक्ष्य बनाए और उनके पूरा होने पर मिलने वाली ख़ुशियों को महसूस करें। इन छोटी-छोटी ख़ुशियों को सेलिब्रेट करना न भूलें।
  5. नए साल में दूसरों के विचारों का सम्मान करने की आदत विकसित करें। 'अनेकांतवाद' से उपजे धैर्य और सहिष्णुता जैसे गुण आपके व्यक्तित्व की मेच्योरिटी को बढ़ाएँगे। विचारों की अति (extreme) से बचते हुए 'मध्यम मार्ग' अपनाएँ।
  6. भरपूर पुरुषार्थ करें पर फल (परिणाम) को लेकर बहुत ज़्यादा चिंतित न हों। नतीजों में आसक्त (attach) न होकर 'निष्काम कर्मयोग' को विकसित करने का अभ्यास करें।
  7. नए दोस्त बनाएँ पर पुराने रिश्तों को भी निभाना सीखें। 'लाख मुश्किल ज़माने में है, रिश्ता तो बस निभाने में है।' परिवार और दोस्तों के साथ 'क्वालिटी टाइम' बिताएँ।
  8. एक-दूसरे के काम आएँ और परस्पर सहयोग की आदत विकसित करें। तत्वार्थ सूत्र में लिखा भी है- 'परस्परोपग्रहो जीवानाम'
  9. कोशिश करें कि किसी ज़रूरतमंद की मदद कर पाएँ। 'Joy of Giving' यानी देने के सुख का कोई मुक़ाबला नहीं है। किसी के चेहरे पर मुस्कान लाने पर आपको जो संतोष मिलेगा, वह अतुल्य है। मिसाल के तौर पर, वक़्त मिलने पर वंचित बच्चों को पढ़ाना उनके जीवन में बदलाव ला सकता है।
  10. अपनी रूचियों/शौक़/ हॉबीज़ को जिएँ। हमेशा कुछ नया सीखने की ललक बनाए रखें। सीखने में हिचकिचाएँ नहीं और श्रेष्ठ विचारों को सभी दिशाओं से आने दें। ऋग्वेद में लिखा भी है- 'आ नो भद्रा क्रतवो यंतु विश्वत:।'
ये उपर्युक्त दस संकल्प रातोंरात विकसित नहीं होंगे। मैं भी निरंतर इनका अभ्यास करता हूँ। आप भी इन्हें प्रैक्टिस में लाएँ, फिर देखिए, आपका जीवन कितना ऊर्जावान, सुखमय और सहज होता जाएगा।
अंत में इसी सकारात्मकता से भरपूर मेरी एक कविता, जो UPSC परीक्षा की तैयारी के दिनों में मैंने नववर्ष की पूर्व संध्या पर लिखी थी:-
सकारात्मक सोच -

सकारात्मक सोच संग उत्साह और उल्लास लिए,
जीतेंगे हर हारी बाज़ीमन में यह विश्वास लिए। 

ऊहापोह-अटकलें-उलझनेंअवसादों का कर अवसान,
हों बाधाएं कितनी पथ मेंचेहरों पर बस हो मुस्कान। 

अंतर्मन में भरी हो ऊर्जानई शक्ति का हो संचार,
डटकरचुनौतियों से लड़करजीतेंगे सारा संसार। 

लें संकल्प सृजन का मन मेंउम्मीदों से हो भरपूर,
धुन के पक्के उस राही सेमंज़िल है फिर कितनी दूर। 

जगें ज्ञान और प्रेम धरा परगूंजे कुछ ऐसा सन्देश,
नई चेतना से जागृत होसुप्त पड़ा यह मेरा देश। 

आप सबको नववर्ष 2017 की ढेर सारी मंगल शुभकामनाएँ!!!
Happy New Year🌾🍃🌲☘🎈🎉✨🎁




Saturday, 24 December 2016

'दंगल'- म्हारी छोरियाँ छोरों से कम हैं के?

'दंगल' : म्हारी छोरियाँ छोरों से कम हैं के? 

खेल का मतलब सिर्फ़ क्रिकेट से लेने वाले करोड़ों भारतीयों को इतनी देर तक कुश्ती के मैच दिखाना और उसके नियम-क़ायदे तक सिखा देना आमिर खान के बस की ही बात है। हरियाणा जैसे सूबे में अपनी बेटियों को पहलवान बनाने का सपना देखना और उसे दिन-रात जीना कोई महावीर सिंह फोगट से ही सीखे। 
मेरी समझ में इस बेहतरीन मूवी के क्या-क्या निहितार्थ हैं और क्या-क्या सीखना हमारे लिए भी काम का हो सकता है, आइए जानें :-
  1. किसी भी बड़ी चाहत को सच करने के लिए थोड़ा जुनून तो चाहिए ही। कुछ पाने के लिए काफ़ी कुछ खोना भी पड़ता है। याद है ना, जयशंकर प्रसाद ने भी लिखा है-"महत्वाकांक्षा का मोती निष्ठुरता की सीप में पलता है।"
  2. जीवन में थोड़ी सी सफलता आगे बड़ी सफलताओं का रास्ता खोल सकती है, बशर्ते आप बौखलाए बग़ैर सहज रहें। गीता-बबीता फोगट के पिता एक संवाद में कहते भी है, "बस एक बात कभी मत भूलना कि तू यहाँ तक पहुँची कैसे?"
  3. लोगों की फ़िज़ूल की बातों के चक्कर में पड़ने वाले लम्बी रेस के घोड़े नहीं बन पाते। इधर-उधर की नकारात्मक बातें बनाने वाले कम नहीं, पर उन्हीं के बीच आपकी मदद करने को तत्पर लोग भी मिल ही जाते हैं।
  4. गीता को ट्रेनिंग देने वाले तथाकथित इंटरनेशनल लेवल के कोच का कैरेक्टर भी बहुत कुछ सिखाता है। झूठा श्रेय लेने, आपको निरंतर हतोत्साहित करने और झूठी ईगो में जीने वाला व्यक्ति आपको तंग करने की ख़ातिर किसी भी हद तक जा सकता है। ऐसे में रहीम के एक दोहे में इस समस्या का समाधान भी छिपा है-
         "रहिमान ओछे नरन सों, बैर भली न प्रीत,
          काटे-चाटे स्वान के, दोऊं भाँति विपरीत।"
         कुल मिलाकर ऐसे लोगों से एक सुरक्षित दूरी बनाए रखना ही बेहतर है।
     5- आख़िरी और बेहद ज़रूरी बात- 'कभी भी अपने व्यक्तित्व की मौलिकता न खोयें'। सहवाग हैं तो सहवाग ही रहें, द्रविड़ बनने के चक्कर में अपने भीतर के 'सहवाग' को अनदेखा न करें। कहने का मतलब है कि नया ज़रूर सीखें, पर अपने 'स्वत्च' या मूल स्वरूप को खोने की क़ीमत पर नहीं। मैंने कहीं पढ़ा था:
"ना किसी के 'अभाव' में जियो, ना किसी के 'प्रभाव' में जियो,
ये ज़िंदगी है आपकी, इसे अपने 'स्वभाव' में जियो।"
(यह कोई टिपिकल फ़िल्म समीक्षा नहीं है। वैसे अगर इसे मूवी देखने के बाद पढ़ने वाला ज़्यादा एप्रिशियेट कर पाएँगे।)







Friday, 2 December 2016

परस्परोपग्रहो जीवानाम

ज़िंदगी की राह बहुत सारे उतार-चढ़ावों और सम-विषम परिस्थितियों से भरी है। आप बेहतरी के लिए जो भी प्रयास करते हैं, उनमें कोई न कोई बाधा आती ही है। कभी-कभी आप महसूस करते हैं कि मुश्किल वक़्त में किसी दोस्त या सम्बंधी की मदद से आप उस परेशानी का सामना कर पाए और फिर से आपने ज़िंदगी की लय पकड़ ली। आप यह भी महसूस करते हैं कि अगर इस वक़्त में कोई अपना या कोई अच्छा दोस्त आपका साथ देता तो शायद आप उस मुसीबत से जल्दी और आसानी से निकल जाते।
कभी-कभी हम यह भी पाते हैं कि ज्ञान और अनुभव का महासागर अनंत और विराट है और हम सबने अभी मुश्किल से इस सागर में एक-एक डुबकी ही लगाई है। अतः किसी एक इंसान के लिए इस विराट सागर की थाह पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। शायद इसीलिए प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात ने एक बार कहा था- 'मैं सबसे ज़्यादा ज्ञानी इस अर्थ में हूँ कि मैं ये जानता हूँ कि मैं कुछ भी नहीं जानता।' यानी सुकरात को अपनी अल्पज्ञता और अकिंचनता का बोध हो गया था और वे इस बात को महसूस कर चुके थे कि उन्होंने इस विराट महासागर की एक बूँद ही चखी है।
लिहाज़ा हम भी सुकरात जितने ज्ञानी भले ही न हों, पर हम यह महसूस तो करते ही हैं कि हम ज्ञान और अनुभव के इस विराट महासागर की थाह अकेले अपने दम पर नहीं पा सकते। हम इतना समझते हैं कि हमारी जानकारी और समझ का दायरा सीमित है और देश-काल-परिस्थितियों की कुछ सीमाएँ हैं, जिनके चलते हम कभी भी सब कुछ नहीं जान सकते। यहाँ यह भी समझना ज़रूरी है कि न तो इस जगत में सर्वज्ञ बनना सम्भव है और न ही वांछनीय।
इस सम्बंध में जैन दर्शन के आचार्य उमास्वामी ने 'तत्वार्थ सूत्र' में एक सूत्र लिखा था- 'परस्परोपग्रहो जीवानाम।' इसका अभिप्राय है कि 'इस जगत में प्राणी एक दूसरे के सहयोग से लाभान्वित होते हैं।' (Living beings benefit by helping each other.) यह सूत्र सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी की प्रक्रिया में भी उतना ही काम आ सकता है जितना आम ज़िंदगी जीते हुए।
अक्सर तैयारी के दौरान हम सोचते हैं कि हमें जो पता है, वो किसी को नहीं पता और हमें अपना ज्ञान और अनुभव सबसे छिपाकर रखना चाहिए। कुछ लोग यहाँ तक भी सोचते हैं, कि अगर मैंने अपने विचार/नोट्स/किताब/रणनीति किसी दोस्त या सहपाठी से साझा कर ली, तो कहीं उसके अंक मुझसे ज़्यादा न आ जाएँ। अगर किसी ने मेरे ज्ञान का फ़ायदा उठा लिया और वह मुझसे पहले परीक्षा में सफल हो गया, तो क्या होगा?
प्रिय दोस्तों, यह सोच एक संकुचित सोच है, जो आपको आगे बढ़ाने के स्थान पर पीछे की ओर धकेलती है। इस तरह की सोच से न तो आपका कोई भला होने वाला है और न ही किसी और का। वास्तविकता तो यह है कि सिविल सेवा परीक्षा की प्रकृति कुछ ऐसी है कि इसमें प्रत्येक अभ्यर्थी के अंक उसके अपने अध्ययन और कौशल के आधार पर आते हैं, न कि महज़ किसी का अनुकरण करने से।
बल्कि मैं तो यह कहूँगा कि इस प्रतिष्ठित परीक्षा के नवीनतम पैटर्न में 'परस्परोपग्रहो जीवानाम' का सूत्र बहुत काम का है और आपकी तैयारी को अधिक व्यापक, डायनमिक और समग्र बना सकता है। अगर किसी टॉपिक विशेष पर आप बेहतर जानते हैं और किसी अन्य टॉपिक पर आपके किसी साथी की समझ अच्छी है, तो आप दोनों मिलकर एक-दूसरे के सहयोग से लाभान्वित हो सकते हैं। 'ग्रुप डिस्कशन' इसका एक बेहतरीन तरीक़ा है। ग्रुप डिस्कशन से ज्ञान और समझ तो बढ़ती ही है, साथ ही बोलने और सुनने का कौशल भी विकसित होता है। इस तरह सिविल सेवा परीक्षा में आप अपेक्षाकृत फ़ायदे की स्थिति में होते हैं।
शास्त्र कहते हैं कि 'विद्या ही एकमात्र ऐसा धन है, जो बाँटने पर बढ़ता है।' यह एक बहुत दिलचस्प बात है। मैंने तैयारी के दौरान बहुत बार यह महसूस किया कि मैं अपने पढ़ी हुई विषयवस्तु को किसी अन्य अभ्यर्थी के साथ बाँट पाऊँ। मनोविज्ञान भी मानता है कि अगर हम अपना ज्ञान किसी से शेयर करते हैं, तो हम उस ज्ञान को लम्बे समय तक मस्तिष्क में स्टोर कर पाते हैं। किसी से कुछ सुनना और किसी को कुछ सुनाना, दोनों ही चीज़ों को याद रखने में मदद करते हैं। साथ ही, पढ़ा हुआ या सीखा हुआ ज्ञान शेयर करने से हमें भी उसके नए आयाम पता चलते हैं, जो शायद हमने पहले सोचे भी नहीं थे। इंग्लिश की एक कहावत भी है-
"Tell me and I forget,
Teach me and I remember,
Involve me and I learn."
'तत्वार्थ सूत्र' का यह सूत्र पढ़ाई में ही नहीं, तैयारी की लम्बी और थकाऊ प्रक्रिया की बाक़ी जटिलताओं में भी आपके काम आता है और आपका मनोबल भी बढ़ाता है। मिसाल के तौर पर, मैं अपने कुछ ऐसे साथियों को जानता हूँ, जो इस तैयारी के दौरान मिलने वाली असफलताओं या तनावों से बहुत प्रभावित हो गए और लगभग अवसाद या डिप्रेशन जैसी हालत में पहुँच गए। ज़िंदगी की दौड़ में अकेले आगे बढ़ने में कोई बुराई भी नहीं है, पर नितांत एकाकी हो जाना कभी-कभी समस्या का कारण बन जाता है। आप अपनी चिन्ताएँ/ तनाव/परेशानियाँ/ ख़ुशियाँ/ मस्तियाँ यदि कभी किसी से साझा नहीं करते, तो आप भीतर ही घुटने लगते हैं और यह स्थिति कभी-कभी जब ज़्यादा बढ़ जाती है, तो मनोविकारों में परिणत हो जाती है। जबकि यदि आप एक-दूसरे का सहयोग करते हुए, हँसते-मुस्कुराते, आगे बढ़ते हैं, तो ज़रूरत या तनाव की स्थिति में आपका साथ देने के लिए आपके परिजन, दोस्त और सहपाठी आपके साथ होते हैं। मत भूलिए कि महाबली हनुमान को भी उनकी भूली-बिसरी शक्तियाँ याद दिलाने के लिए जाम्बवंत को 'का चुप साधि रहा बलवाना' कहना पड़ा था।
साथ-साथ क़दम बढ़ाना का यह संदेश हमारे वेदों में भी दिया गया है-
'सं गच्छ्ध्वम सं वदध्वम सं वो मनांसि जानताम।'
यानी साथ-साथ चलो, साथ-साथ बोलो और साथ-साथ एक दूसरे के मन को समझो। इसका अर्थ यदि थोड़ी गहराई से समझें, तो हम जान पाएँगे कि ज़िंदगी की राह में हमारा एक-दूसरा का साथ देना या एक-दूसरे के काम आना कितना ज़रूरी है। विशेषकर, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में तो यह बहुत उपयोगी है। एक-दूसरे से अपना ज्ञान-अनुभव-समझ-कौशल बाँटने से ये सभी बढ़ते ही हैं, घटने का तो कोई सवाल ही नहीं है।
किसकी मदद की कब ज़रूरत पड़ जाए, या कौन कब आपके काम आ जाए, इसका कुछ पता नहीं। कभी-कभी तो किसी परीक्षा या अवसर की जानकारी हमें किसी और से ही होती है। इसी तरह कभी-कभी हम किसी की मदद से ही तैयारी की सही दिशा और गति पकड़ पाते हैं। दोस्तों, 'बूँद-बूँद से ही सागर भरता है। एक-दूसरे के सहयोग से एक परस्पर प्रेम और सौहार्द का अद्भुत वातावरण बनाएँ और ज्ञान व सूचना की नवीन क्रांति
से लाभान्वित हों।
शुभकामनाएँ!!!

Tuesday, 29 November 2016

परफ़ेक्शन को कहें 'ना'....

भारतीय संविधान में अनुच्छेद 51(क) में उल्लिखित मूल कर्तव्यों में से एक कर्तव्य है-
"व्यक्तिगत  और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करना, जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊँचाइयों को छू ले।"
यानी इसमें कोई भी संदेह नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने निजी और सार्वजनिक जीवन में बेहतरी की ओर बढ़ने का प्रयास करते रहना चाहिए और जीवन में उत्कृष्टता की उपलब्धि करने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए। हम अपने आस-पास के माहौल में यह भी निरंतर देखते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति यथासंभव कुछ न कुछ प्रयास करके ऊँचाई को छूने की कोशिश करता ही है। एक किसान चाहता है कि अगली बार वह बेहतर पद्धतियों और संसाधनों का प्रयोग कर पहले से ज़्यादा और गुणवत्तापूर्ण फ़सल उगा सके, व्यापारी चाहता है कि उसके ग्राहक बढ़ते जाएँ और बैलेंस शीत शिखर को छू जाए, नौकरीपेशा कर्मचारी का ख़्वाब है कि उसका लम्बित प्रमोशन जल्दी से जल्दी हो और उसके वेतन ग्रेड में आशातीत बढ़ोतरी हो जाए। इसी तरह किसी भी परीक्षार्थी का इस दिशा में भरपूर प्रयास है कि वह परीक्षा में सफलता के लिए वांछित सभी चरणों में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर अपने सपनों को साकार कर ले।
उत्कृष्टता और बेहतरी की यह चाहत स्वाभाविक है और यह जीवन की सार्थकता की ओर ले जाने में निश्चय ही सहायक होती है। अंग्रेज़ी के कवि RW Emerson ने इसीलिए युवाओं के विषय में इसीलिए लिखा भी है-
"Brave men who work while others sleep,
Who dare while others fly,
They build a nation's pillars deep,
And lift them to the sky."

पर कभी-कभी आगे बढ़ने और लक्ष्य प्राप्त करने की यह एक जुनून या फिर उससे भी ज़्यादा एक फ़ितूर का रूप लेने लगती है। कुछ साथियों को ऐसा लगने लगता है कि यदि उन्हें यूपीएससी की इस प्रतिष्ठित और सर्वोच्च मानी जाने वाली परीक्षा में सवाल होना है तो उन्हें हर काम परफ़ेक्शन के साथ करना होगा। इसी धुन में वह 'परफ़ेक्शनिस्ट' या 'अतिमानव' बनने की कोशिश करने लगते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि 'परफ़ेक्ट' जैसा कुछ भी नहीं होता और न ही इस परीक्षा या किसी भी परीक्षा में सफलता के लिए आपको परफ़ेक्ट बनने की दरकार है।
परफ़ेक्शनिस्ट बनने का यह आग्रह ही ख़ुद से एक ज़्यादती है। क्योंकि कोई भी चीज़ या कोई भी व्यक्ति स्वयं में पूर्ण या परफ़ेक्ट नहीं होता। एक कहावत भी है-
"There is no perfect way,
There are many good ways."
हममें से कोई भी अतिमानव या 'सुपरमैन' नहीं है और न ही ऐसा बनना वांछनीय है। ज़रूरत है तो सकारात्मक सोच के साथ, व्यापक व संतुलित नज़रिया अपना कर सही दिशा में निरंतर प्रयास करते जाने की, ताकि अभीष्ट लक्ष्य हासिल हो सके।
परफ़ेक्शन के इसी जुनून के चक्कर में कुछ अभ्यर्थी बहुत महत्वाकांक्षी और ग़ैर-व्यावहारिक योजनाएँ बनाते हैं। ये हवाई प्लान ज़मीन से कोसों दूर होने के कारण वास्तविकता में परिणत न तो होने थे और न ही हो पाते हैं। आपने अपने आस-पास ऐसे अभ्यर्थी ज़रूर देखे होंगे, जो प्लानिंग बहुत बड़ी-बड़ी करते हैं, पर लागू करने में बहुत पीछे रह जाते हैं।
कभी-कभी हम परीक्षा के तैयारी के दौरान हम परफ़ेक्ट बनना चाहते हैं और हर चीज़ को बेस्ट तरीक़े से करना चाहते हैं। जैसे- हमारा स्टडी मैटेरियल, कोचिंग, टेस्ट सिरीज़, रिवीज़न, नोट्स, दिनचर्या सभी कुछ सर्वश्रेष्ठ होना चाहिए, तभी हमारी
बेस्ट रैंक आएगी और हम UPSC टॉपर बनेंगे।
 इस तरह अतिशय भावुकता में हम बड़ी-बड़ी योजनाएँ और आदर्श दिनचर्या का शेड्यूल तो निर्मित कर लेते हैं, पर जब उनके क्रियान्वयन की बारी आती है तो शुरुआती उत्साह धीरे-धीरे ढीला पड़ने लगता है और हम अपने लक्ष्यों से पीछे होते जाते हैं, जिससे लक्ष्य लम्बित होने लगते हैं और एक के बाद एक बैकलॉग बढ़ता जाता है।
इस बैकलॉग का स्वाभाविक परिणाम धीरे-धीरे खीझ, कुंठा और तनाव के रूप में सामने आता है और हम नाहक ही परेशान और व्यग्र रहने लगते हैं। इस स्ट्रेस और व्यग्रता का असर हमारी पढ़ाई और तैयारी पर स्वाभाविक तौर पर पड़ता ही है और आदर्शवादी लक्ष्य पाना तो दूर, हम सामान्य से लक्ष्यों को पाने में ही ख़ुद को अक्षम पाने लगते हैं।
लाख टके का सवाल यह है कि अनावश्यक रूप से उपजी इस मुसीबत और नकारात्मकता से छुटकारा पाने के लिये हम पहले से ही क्या करें, क्या न करें और कैसे करें?
इस स्थिति से बचने के लिए बेहतर समाधान यह हो सकता है कि जब भी हम योजनाएँ या स्टडी प्लान बनाएँ तो उसमें अपनी क्षमता, सामयिक परिस्थितियाँ, अपने उद्देश्यों, अपनी महत्वाकांक्षा का स्तर और उपलब्ध समय आदि को ध्यान में रखते हुए प्लानिंग करें। यह प्लानिंग व्यावहारिकता और वास्तविकता के धरातल पर रहकर बनाएँ, न कि ख़ुद को 'सुपरमैन' समझकर। हर अभ्यर्थी की क्षमताएँ और अध्ययन व अभ्यास का स्तर व कौशल भिन्न-भिन्न होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में विशिष्ट होता है। किसी भी सफल व्यक्ति या टॉपर को ज्यों-का- त्यों कॉपी करने के चक्कर में अपने लिए अव्यावहारिक और कुछ हद तक 'असम्भव' योजनाएँ बनाना कहाँ की समझदारी है।
किसी सफल व्यक्ति से प्रेरणा लेना या उससे मार्गदर्शन लेना अच्छी बात है, पर अपने व्यक्तित्व और तैयारी के स्तर को अनदेखा करके 'परफ़ेक्शन' के पीछे भागना आपके लक्ष्यों को वास्तविकता से दूर ले जा सकता है। सिविल सेवा परीक्षा के दौरान कभी-कभी एक और उलझन होती है। हम हर महीने नए टॉपर का इंटरव्यू पढ़ते हैं और हर टॉपर से प्रभावित होते हैं। यह स्वाभाविक है और उससे प्रेरणा और मोटिवेशन लेने में कोई समस्या भी नहीं है। पर कभी-कभी हम किसी व्यक्ति या टॉपर को परफ़ेक्ट समझने के चक्कर में हम उसे आँख बंद करके उसका अनुकरण करने लगते हैं। मेरा यही आग्रह है कि 'प्रेरणा लें, पर अंधानुकरण न करें'।
यहाँ यह भी समझना ज़रूरी है कि टॉपरों और अभ्यर्थियों में कोई बहुत ज़्यादा फ़र्क़ नहीं होता। ज़्यादातर टॉपर सफलता के बाद ख़ुद स्वीकारते हैं कि उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि वे ऐसा असाधारण प्रदर्शन करेंगे। कोई भी समझदार अभ्यर्थी सही तरीक़े से परिश्रम और पुरुषार्थ के द्वारा टॉपर बन सकता है।
 पर टॉपरों के इंटरव्यू पढ़कर कई अभ्यर्थी यह सोचकर कनफ़्यूज हो जाते हैं कि कौन सी रणनीति सर्वश्रेष्ठ है? कारण यह है कि हर टॉपर की पृष्ठभूमि, व्यक्तित्व और रणनीति अलग-अलग होती है। उदाहरण के तौर पर, किसी टॉपर ने किसी जॉब के साथ तैयारी की थी, किसी ने पढ़ाई करते-करते तैयारी की, तो कोई सब कुछ छोड़कर समर्पित रूप से तैयारी करके सफल हुआ। अब यदि हम सभी टॉपरों का एक साथ अनुकरण करने लगेंगे तो ऊहापोह होना तय है।
मैं आपसे यही कहूँगा कि आपके लिए वही रणनीति श्रेष्ठ है जो आपके व्यक्तित्व और अध्ययन-अनुभव-तैयारी के स्तर के अनुकूल हो। बस इतना सा करना है कि एक बेहतर और व्यावहारिक रणनीति बनाकर उसका क्रियान्वयन करें और सुधार की कोशिश हमेशा जारी रखें। छोटे-छोटे व्यावहारिक लक्ष्य बनाएँ और उन्हें धीरे-धीरे पूरा करते जाएँ और तनावमुक्त रहें।
'परफ़ेक्शन' का फ़ितूर न हो, पर सुधार (improvement) की उम्मीद और गुंजाइश हमेशा बनी रहनी चाहिए। हमें अपनी रणनीति और तैयारी के तरीक़े को लेकर इतना भी रक्षात्मक नहीं होना चाहिए कि हम ज़रूरत और प्रासंगिकता के मुताबिक़ समय-समय पर वांछनीय परिवर्तन और सुधार न कर सकें। ज़रूरत के मुताबिक़ ख़ुद को ढालने में हमेशा समझदारी होती है।
जब हम 'परफ़ेक्शन' पर बात कर ही रहे हैं तो हमें यह भी समझ लेना चाहिए, कि हम भले ही काल्पनिक 'परफ़ेक्शन' से दूर रहें, पर अपना 'बेस्ट' देने में भी कोई कसर न छोड़ें। अगर आप अपने लक्ष्य को लेकर गम्भीर हैं तो आप अपनी पूरी क्षमता और पूरे मनोयोग से तैयारी करें और अपना 'सर्वश्रेष्ठ' दें ताकि आप अपना 'सर्वश्रेष्ठ' प्रदर्शन कर वांछित परिणाम हासिल कर सकें। ये और बात है कि परिणाम आपके पक्ष में आए या नहीं पर कम से कम यह तसल्ली तो रहेगी कि मैंने अपना बेस्ट किया और अपनी कोशिशों में कोई कसर नहीं छोड़ी। यदि आपने पूरे मन और विश्वास से पुरुषार्थ करते हैं, तो आपकी सफलता कि सम्भावनाएँ कई गुना बढ़ जाती हैं।
अपने परिश्रम और अध्यवसाय की यात्रा को मस्ती के साथ एंजॉय करते हुए जब आप आगे बढ़ेंगे तो आपको महसूस होगा कि कभी-कभी 'सफ़र मंज़िल से भी ज़्यादा ख़ूबसूरत होता है।'
किसी शायर ने लिखा भी है-
'मंज़िल मिले या नहीं मुझे उसका ग़म नहीं,
मंज़िल की जुस्तज़ू में मेरा, कारवाँ तो है।'
अतः 'चरैवैति- चरैवेति' का मंत्र अपनाएँ और 'यूँ ही चला चल राही' की तर्ज़ पर अपना 'बेस्ट' देते हुए अपने सपनों की राह पर सही दिशा में पूरी हिम्मत के साथ बढ़ते जाएँ।

डियर ज़िंदगी, I Love you


कल शाम Dear Zindagi मूवी देखी। तभी से मन में कुछ हलचल सी थी, सोचा कि लिख डालूँ और साझा करूँ।
छोटी सी, प्यारी सी इस ज़िंदगी में रोज़मर्रा की भागदौड़ के बीच हल्की-फुल्की उठापटक, उलझनें और सुलझनें, छोटे-बड़े उतार-चढ़ाव होते रहना स्वाभाविक भी है और लाज़मी भी।
पर क्या हमने ख़ुद से कभी ये छोटा सा सवाल पूछा है कि हम इन मुश्किलों या छुट-पुट दिक्कतों का सामना करने के लिए तैयार हैं? क्या हम अपनी ज़िंदगी से और ख़ुद से सचमुच प्यार करते हैं? कहीं हम आगे बढ़ने की होड़ में रिश्तों और ख़ुद की ज़िंदगी से खिलवाड़ तो नहीं कर रहे?
मन के नाज़ुक से कोने में बसे इसी तरह के कुछ प्रासंगिक और ज़रूरी सवालों के जवाब ढूँढती यह मूवी अनायास ही किस तरह अपने ज़िंदगी को जी भर कर जीने और प्यार करने के नुस्ख़े सिखाती है, आइए जानें:-
- कभी-कभी हम मुश्किल रास्ता इसलिए चुनते हैं क्योंकि हमें लगता है कि महत्वपूर्ण चीज़ पाने के लिए हमें मुश्किल रास्ता चुनना चाहिए। हम मुश्किल रास्ता ही चुनना चाहते हैं। ख़ुद को सज़ा देना चाहते हैं। पर सवाल यह है कि अगर आसान रास्ता उपलब्ध है तो उसे अपनाने में भला क्यों हिचकिचाना? आसान रास्ता भी तो एक रास्ता है।
- जब कुर्सी ख़रीदने के लिए इतने विकल्प देखते हैं, तो ज़िंदगी के महत्वपूर्ण निर्णय लेने में उपलब्ध विकल्पों पर थोड़ा सोचना तो बनता है।
-क्या रोज़ 10 मिनट मम्मी-पापा से बात करना सचमुच इतना मुश्किल काम है?
-जीनियस वो नहीं होता जिसके पास हर सवाल का जवाब हो, बल्कि जिसके पास हर जवाब तक पहुँचने का धैर्य हो।
-हर टूटी हुई चीज़ जोड़ी जा सकती है।
-पागल वो है जो रोज़-रोज़ एक ही काम करता है और चाहता है कि नतीजा अलग हो।
- अपनी ज़िंदगी के स्कूल में हम सब ख़ुद अपने शिक्षक हैं।
- अपनी ज़िंदगी की पहेली को सुलझा आप ख़ुद ही सकते हैं पर दूसरे इसमें आपकी मदद ज़रूर कर सकते हैं।
- जो भी कहना चाहते हो, उसे कह डालो, बजाय दिल पर बोझ रखकर घूमने के।
-ज़िंदगी में जब कोई आदत या पैटर्न बनता दिखाई दे, तो उसके बारे में सोचना चाहिए। अक़्लमंदी ये जानने में है कि कहाँ उस आदत को रोकना है।
- कोई हमें अलविदा न बोल सके, उससे पहले ही हम इस डर से उसे अलविदा बोल देते हैं कि कहीं पहले वह अलविदा न बोल दे।
क्यों न उस डर को अलविदा बोल दें। आओ, आज़ाद हो जाएँ अपने मन में बसे डर से।
किसी शायर ने लिखा भी है-
'मुहब्बत के शहर का आबो-दाना छोड़ दोगे क्या,
जुदा होने के डर से दिल लगाना छोड़ दोगे क्या,
ज़रा सा वक़्त क्या गुज़रा, कि चेहरों पर उदासी है,
ग़मों के ख़ौफ़ से तुम मुस्कुराना छोड़ दोगे क्या।'

Saturday, 22 October 2016

मेरा शहर : मेरा गीत - 'शहर जिसे कहते हैं मेरठ'

मेरा शहर : मेरा गीत - 'शहर जिसे कहते हैं मेरठ'
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 शहर मेरे तू मेरी मुहब्बत, तू है मेरी जान,
गंगा-जमुनी आन-बान की तू सच्ची पहचान।

शहर-छावनी में सोया है, सदियों का इतिहास,
महाभारत से जंग-ए आज़ादी तक का अहसास,
सन सत्तावन की क्रान्ति की, तूने छेड़ी तान।

हिन्दी -उर्दू के लफ़्ज़ों में, तेरी महक समाई,
मन्त्र-अजानें-गुरूबानियाँ, तूने सदा सुनाईं,
शान्ति-अमन की परम्परा का, बना रहे सम्मान।

हर जुबान में घुली तेरे, गन्नों की ग़ज़ब मिठास,
गज़क-रेवड़ी स्वाद बिखेरें, मेरठ का वो ख़ास,
काली पलटन-घंटाघर-नौचंदी तेरी शान।

सपनों के आज़ाद परिन्दे, भर लें वो परवाज़,
देश और दुनिया में गूंजे, तेरी ही आवाज़,
कायम रहे क़यामत तक तू, इतना सा अरमान।


-निशान्त जैन

Thursday, 20 October 2016

उत्कृष्ट लेखन कौशल : सफलता का आधार

"कुछ लिख के सो, कुछ पढ़ के सो,
 तू जिस जगह जगा सवेरे, उस जगह से बढ़कर सो।"

कवि भवानी प्रसाद मिश्र की ये पंक्तियां किसी भी युवा के सर्वांगीण विकास के लिए प्रेरक हैं। आत्म विकास की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। हम प्रतिदिन अपने ज्ञान और अनुभव से कुछ नया सीखते हैं और उसे अपने समग्र व्यक्तित्व में जोड़ते जाते हैं। कुछ सुनना, कुछ पढ़ना, कुछ बोलना और कुछ लिखना ये चारों मिलकर हमारे व्यक्तित्व को हर रोज तराशते हैं और हम खुद में गुणात्मक सुधार कर प्रगति पथ पर बढ़ते जाते हैं।
भाषा पर अधिकार और अच्छी पकड़ होने का सिविल सेवा परीक्षा में कितना कारगर महत्व है, इसकी चर्चा करने के बाद हम प्रतियोगी परीक्षाओं में उपर्युक्त चार कौशलों में से विशेष महत्वपूर्ण लेखन कौशल पर विशेष चर्चा करेंगे। साथ ही यह भी जानने की कोशिश करेंगे कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यूपीएससी में सफलता का आधार माने जाने वाले इस लेखन कौशल को कैसे उत्कृष्ट बनाया जा सकता है और किस प्रकार इसमें गुणात्मक सुधार लाया जा सकता है।
भाषा के अन्य कौशलों की तरह ही लेखन कौशल पर भी पकड़ एक-दो दिनों में नहीं बनाई जा सकती। लेखन कौशल को बेहतर बनाने का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और अनिवार्य तत्व निरंतर अभ्यास है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि
"करत-करत अभ्यास ते, जड़ होत सुजान, रस्सी आवत-जात ते सिल पर पड़त निशान।"

लिहाजा अपनी ताकत और अपनी कमजोरियों दोनों ही पहचानते हुए लेखन कौशल का अभ्यास शुरू करें। अभ्यर्थियों के सामने लेखन अभ्यास करने की दिशा में सबसे बड़ी समस्या यह आती है कि इसे शुरू कैसे करें? तमाम छात्र यही कहते हैं कि मुझे तो लिखना बिल्कुल नहीं आता.... यूपीएससी के स्तर का लेखन कौशल तो बहुत दूर की कौड़ी है..... क्या मैं भी अच्छा लिखना सीख पाऊंगा..... मैं यूपीएससी टॉपर जैसा लेखन कौशल शायद ही कभी प्राप्त कर पाऊं.....आदि-आदि।
William Faulkner ने लिखा है, 'Get it down, take chances. It may be bad, but it's the only way, you can do anything, really good' 
लेखन कौशल का अभ्यास शुरू करने की उलझन और उहापोह से निकलने का सबसे बढ़िया तरीका उपर्युक्त उक्ति में ही छिपा है। यह बात अपने दिमाग से एकदम निकाल दें कि आप खराब लिखेंगे या फिर अच्छा लिखेंगे। बस आप लिखना शुरू कीजिए और फिर देखिए कि किस तेजी से आपके लेखन कौशल में सुधार आना शुरू होता है। एक और दिलचस्प बात यह है कि आपका लेखन कौशल बेहतर हो या फिर बेहतर से कम हो, दोनों ही दशाओं में आपको लेखन कौशल का अभ्यास करना ही है। यदि आप बहुत अच्छा लिखते हैं, तो bhi अभ्यास से आपके लेखन का स्तर बेहतर ही होगा और अगर अाप उतना अच्छा नहीं लिख पाते, तो लेखन अभ्यास आपके लेखन कौशल में गुणात्मक और नाटकीय सुधार के लिए निश्चय ही अनिवार्य है।

आइए बिंदुवार चर्चा करते हैं, उन तरीकों की, जिनसे हम अपने लेखन कौशल में सुधार कर, उसे उत्कृष्टता के स्तर तक ले जा सकते हैं : -
1. निरंतर अभ्यास की आदत बनाए रखें और इस छूटने ने दें। यह आदत आपके रूटीन का हिस्सा बन गई, तो यह आपके प्रदर्शन और मार्कशीट में जबर्दस्त सुधार ला सकती है।
2. लेखन कौशल का अभ्यास करने के साथ-साथ लिखे गए उत्तरों/निबंधों/केस स्टडी को किसी अच्छे अनुभवी मित्र या किसी मार्गदर्शक से जंचवाते रहें या फिर कोई अच्छी टेस्ट सीरीज भी जॉइन कर सकते हैं। समय-समय पर उत्तरों की जांच कराने से आपको यह अहसास होगा कि आपके लेखन कौशल में दिनोंदिन कितना सुधार हो रहा है। इससे आपको सकारात्मक मोटिवेशन तो मिलेगा ही, साथ ही कुछ सुधार हेतु काम की सलाहें व इनपुट्स भी मिल जाएंगे।
3.  तीसरी बेहद महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल लिखते रहने से अच्छा लेखन कौशल अर्जित नहीं किया जा सकता। इसके लिए आपको अच्छा पढ़ने की आदत भी विकसित करनी होगी। अनुकरण मानव मनोविज्ञान की एक विशेषता है। अगर आप अच्छी पाठयपुस्तक पढ़ेंगे और साथ में कभी-कभी अच्छे और नामचीन लेखकों की मशहूर किताबें या कुछ फिर कुछ प्रतिष्ठित पत्रिकाओं पर भी नजर डाल लेंगे, तो खुदबखुद ही आपमें अच्छा लिखने की कला विकसित हो जाएगी। ध्यान दें कि आपको यूपीएससी की परीक्षा में सफलता हासिल करने के लिए कवि, लेखक या फिर साहित्यकार बनने की जरूरत नहीं है। जरूरत सिर्फ इतनी है कि यूपीएससी परीक्षा के स्तर का ठीक-ठाक लेखन कौशल अर्जित कर लिया जाए।
4.  इसके अतिरिक्त लेखन कौशल को बेहतर बनाने का एक और सूत्र है, लिखने के दौरान समावेशी, एकीकृत और समग्र दृष्टिकोण अपनाना। कोशिश करें कि जब भी आप लिखें, तो संतुलित तरीके से लिखें। हर सिक्के के दो पहलू होते हैं और सत्य उनके बीच कहीं छिपा होता है। लिहाजा किसी भी प्रकार की अति (extreme) से बचें। दूसरे, लेखन अभ्यास के दौरान यह कला भी विकसित करें कि विषय या प्रश्न से जुड़े ज्यादातर पहलुओं का समावेश कर पाएं। इसे समास शैली कहते हैं। ज्यादा बातों को कम शब्दों में अभिव्यक्त कर देना यानी गागर में सागर भरना एक बेहतरीन स्किल है और इसे अभ्यास से अर्जित किया जा सकता है।
5. आखिरी पर महत्वपूर्ण बात है, चीजों को कनेक्ट करने का स्किल। 'connecting the dots' यानी कि बिखरे हुए बिंदुओं को जोड़ना एक बहुत काम का स्किल है। उदाहरण के तौर पर, जो अभ्यर्थी अभ्यास से सीखकर किसी भी विषय के सैद्धान्तिक पक्ष और व्यावहारिक पक्ष को परस्पर जोड़ पाते हैं, उनके अंकों में जबर्दस्त सुधार हो पाता है। साथ ही ज्ञान के विविध अनुशासनों, यथा आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक आदि को परस्पर कनेक्ट करना आपके लेखन को उत्कृष्टता के स्तर पर ले आता है। ऐसा करना उतना भी मुश्किल नहीं है। वैसे भी हमें आम तौर पर विशेषज्ञ (specialist) वाली एप्रोच ना रखकर सामान्यज्ञ ( generalist) एप्रोच रखनी चाहिए।
6. लेखन कौशल का एक महत्वपूर्ण आयाम है, संक्षेपण और पल्लवन की कला। यूपीएससी की परीक्षा में अक्सर ऐसा होता है कि किसी विषय पर आपकी जानकारी कम होती है, पर उसके उत्तर की शब्द सीमा ज्यादा होती है। कभी-कभी इसके उलट भी होता है। किसी प्रश्न के उत्तर में हमें भरपूर ज्ञान है, लेकिन उत्तर लिखना होता है 200 या 300 शब्दों में। ऐसे में, अगर आप ज्यादा ज्ञान को कम शब्दों में समेटने और कम सूचना को अधिक शब्दों में पल्लवित करने की कला सीख जाएं, तो काम काफी आसान हो जाएगा।
लेखन कौशल को उत्कृष्ट बनाने के लिए जरूरी है कि हम कुछ ऐसे तरीकों को भी समझें, जिनसे हम अपनी अभिव्यक्ति और प्रस्तुति में मामूली सुधार कर अच्छे अंक प्राप्त कर सकते हैं।
बेहतर अंक पाने के सूत्र-
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अच्छे अंक पाने की कुंजी है, बेहतर प्रस्तुतीकरण। क्या आपने कभी ये सोचा है कि बराबर ज्ञान रखने और बराबर परिश्रम करने वालों के बीच प्राप्तांकों में इतना अंतर क्याें आ जाता है? इसका बड़ा कारण यह है कि कथ्य या उत्तर कैसे प्रस्तुत किया गया है। अगर भोजन अच्छा बना हो और उसे कायदे से परोस भी दिया जाए, तो सोने पर सुहागा हो जाता है। इसलिए प्रस्तुतिकरण की कला सीखें। इसके लिए आप अग्रलिखित बिंदुओं को फॉलो कर सकते हैं:-

a- स्पष्ट लिखें और सुव्यवस्थित लिखें। अभिप्राय यह है कि आपका कथ्य तो स्पष्ट हो ही, साथ ही आपका उत्तर देखने में भी स्पष्ट और स्वच्छ हो, तो इससे परीक्षक पर बेहतर प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के तौर पर अगर आप लिखने के दौरान बार-बार कटिंग करते हैं, तो यह कमोबेश नकारात्मक प्रभाव डालता है। 
b- वर्तनी की गलतियों से बचने की कोशिश करें। एक परिपक्व ग्रेजुएट से इतनी अपेक्षा की जाती है कि वह सही वर्तनी लिखना जानता हो और व्याकरण की गलतियां ना करे। 
c- हैंडराइटिंग पर अभ्यर्थियों में काफी उलझन और उहा-पोह की स्थिति रहती है। यूपीएससी ने स्वयं अपने निर्देशों में लिखा है कि आपकी हस्तलिपि पठनीय होनी चाहिए। लिहाजा आपसे अपेक्षा है कि स्पष्ट और यथासंभव अच्छी हैंडराइटिंग में लिखने का प्रयास करें।
d- राइटिंग स्पीड का बेहतर होना वर्तमान पैटर्न की जरूरत है। प्रश्नपत्र को पूरा हल करने के लिए आपको तेज गति से लिखने का अभ्यास करना होगा। अच्छे अंक पाने के लिए लगभग पूरा पेपर हल करना जरूरी होता है। अत: राइटिंग स्पीड सुधारें, लेकिन साथ ही पठनीयता भी बनाए रखें। इसका समाधान ज्यादा से ज्यादा अभ्यास करना ही है। मेरी मानें तो यह इतना मुश्किल भी नहीं है।
e- पैराग्राफ में लिखें अन्यथा परीक्षक के लिए आपका उत्तर पढ़ना और समझना मुश्किल हो सकता है। यूपीएससी की उत्तर पुस्तिका की नमूना कॉपी लेकर, उस पर पैराग्राफ में लिखने का अभ्यास करें। पैराग्राफ ज्यादा बड़े ना हों। ध्यान रखें कि नई बात हमेशा नए पैराग्राफ से शुरू करें। 
f- मेरा अनुरोध है कि शब्द सीमा का कड़ाई से पालन करें। एक प्रश्न का उत्तर अच्छी तरह से लिखने की कोशिश में, बाकी प्रश्नों को नजरअंदाज न करें। साथ ही मेरी व्यक्तिगत सलाह यह है कि आप अपने उत्तरों को निर्धारित शब्द सीमा से 20-25 शब्द कम में भी समेट सकते हैं। इससे आपको पूरा पेपर हल करने में मदद मिलेगी। यह भी पहले ही अंदाजा लगा लें कि आप आमतौर पर एक पृष्ठ कितने शब्द लिखते हैं। इससे आपको निर्धारित शब्द सीमा का पालन करने में आसानी होगी। ऐसा ना हो कि आपको परीक्षा हॉल में बैठकर लिखे हुए उत्तर के शब्द गिनने पड़ें। 10-20 शब्द इधर-उधर हो जाएं, तो परेशान होने की जरूरत नहीं है। 
g- सुव्यवस्थित और क्रमबद्ध तरीके से लिखे प्रवाहयुक्त लेखन के लिए जरूरी है कि सहसा जो मन में आए, उसे लिखने से बचते हुए 'कहीं की ईट कहीं का रोड़ा' न जोड़ें। मेरा विनम्र अनुरोध है कि समय कम होने की स्थिति में मन ही मन एक रूपरेखा बनाकर उसे क्रमबद्ध और सुव्यवस्थित तरीके से लिखें। निबंध लिखते समय रूपरेखा बनाने का पर्याप्त समय होता है, लेकिन सामान्य अध्ययन या वैकल्पिक विषय में प्रायः समयाभाव के चलते यह सुविधा नहीं मिल पाती। अत: 150-200 शब्दों के उत्तर को भी व्यवस्थित तरीके से लिखें, तो बेहतर अंक मिलेंगे। शब्द सीमा के कारण  2-3 पंक्तियों की भूमिका और 2-3 पंक्तियों का ही निष्कर्ष दे सकते हैं। 
h- नए पैटर्न में अब सामान्य अध्ययन व निबंध के प्रश्नपत्रों में प्रश्न-सह -उत्तर पुस्तिका दी जाती है। इसमें प्रश्न के साथ ही उत्तर लिखने का खाली स्थान दिया होता है। यहां मेरी व्यक्तिगत सलाह है कि यथासंभव क्रम से प्रश्नों को हल करें, क्योंकि पुराने पैटर्न की तरह अब आप उत्तर पुस्तिका में अपनी सुविधा के अनुरूप प्रश्नों को क्रम नहीं बदल सकते। पुराने पैटर्न में हम प्रायः वह प्रश्न पहले हल करते थे, जिनके उत्तर बेहतर तरीके से आते थे। 
i- अभ्यर्थियों की एक बड़ी उलझन यह भी होती है कि हम उत्तर लिखते समय किस प्रकार की भाषा इस्तेमाल करें। मेरा मानना है कि भाषा पर अधिकार का मतलब शुद्ध संस्कृतनिष्ठ भाषा का ही प्रयोग नहीं है। सामान्य, सहज और सरल भाषा का इस्तेमाल करें। उर्दू और अंग्रेजी के ऐसे शब्द जो पूरी तरह हिंदी में घुल-मिल गए हैं, उनका प्रयोग कर सकते हैं। बस सहजता का ध्यान रखें। 
इस प्रकार सार रूप में कहूं, तो लेखन कौशल को बेहतर बनाना इतना भी कठिन नहीं है। निरंतर परिश्रम, लगन और इच्छाशक्ति से राइटिंग स्किल इम्प्रूव कर अच्छे अंक पाने की ओर कदम बढ़ाए जा सकते हैं। 
'जहां चाह, वहां राह।'

Thursday, 22 September 2016

भाषा पर अधिकार बना सकता है अधिकारी

शब्द हैं कि वे आपके मनोभावों को बखूबी सम्प्रेषित कर पाते हैं। भाषा पर अधिकार मानव की सजृनात्मकता को अभिव्यक्ति, कल्पना को जुबान और कथ्य को आकार प्रदान करता है। किसी भी व्यक्ति का भाषा पर अधिकार उसको जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने में सहायता प्रदान करता है। यूपीएससी की परीक्षा भी इस कथन के दायरे से बाहर नहीं हैं।
मैंने अपनी समझ में यूपीएसी टॉपरों में कुछ ऐसे गुण अनुभव किए हैं, जो उन्हें आम से खास बनाते हैं और उनकी सफलता की राह काफी आसान कर देते हैं। जैसे :
1 भाषा पर प्रभावी अधिकार
2 उत्कृष्ट लेखन कौशल
3 व्यापक नजरिया
4 ज्ञान का वृहद दायरा
मेरा मानना है कि आपने यूपीएससी की परीक्षा के लिए जिस भी भाषा को माध्यम के रूप में चुना है, उस पर आपकी अच्छी खासी पकड़ आपकी सफलता की राह को बहुत हद तक आसान बना सकती है। ऊपर बताई गई चारों विशेषताएं कमोबेश भाषा पर अधिकार से जुड़ी हैं। यदि आपकी भाषा पर मजबूत पकड़ है, तो आपका लेखन कौशल तो बेहतर होगा ही , साथ ही अच्छा पढ़ने की आदत आपके दृष्टिकोण को भी समग्र और व्यापक बना सकती है। यदि भाषा पर आपका बेहतर अधिकार है, तो आप चीजों को औरों की अपेक्षा बेहतर ढंग से समझते अौर समझ का दायरा औरों की तुलना में बढ़ जाता है।
भाषा के चार कौशल माने जाते हैं :
1 सुनना
2 बोलना
3 पढ़ना
4 लिखना
ये चाराें स्किल मिलकर किसी भी भाषा पर आपका अधिकार बनाते हैं। फ्रांसिस बेकन ने अपने मशहूर निबंध of students में लिखा है, ' reading makes a full man, confrence a ready man, writing an exact man.' Reading adds perfection to a man's personality.
सुनने के कौशल को अक्सर गैर जरूरी समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। जबकि सुनने का स्किल एक बेहद महत्वपूर्ण स्किल है। यदि यूपीएसी की परीक्षा की तैयारी के संदर्भ में बात करें, तो जो लोग विभिन्न कक्षाएं, लेक्चर, विडियो, टीवी शो और रेडियो आदि पर धैर्यपूर्वक कंसेप्ट को समझते हुए सुन पाते हैं, वे निश्चित तौर पर बेहतर समझ निर्मित कर ठीक से ज्ञान अर्जित कर पाते हैं। लिहाजा सुनने के स्किल  का विकास करना सिविल सेवा परीक्षा के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना पढ़ने या या लिखने का कौशल। सुनने के कौशल के विकास के लिए जरूरी है कि मन को स्थिर करके धैर्य के साथ सुनने की आदत विकसित करें। धैर्यपूर्वक सुनने, उसे समझने और फिर प्रतिक्रिया देने की यह आदत पढ़ाई के दौरान ही नहीं, बल्कि सिविल सेवाओं के इंटरव्यू में बेहद काम आती है।
वाक् कौशल यानि बोलने का स्किल, भाषा का दूसरा महत्वपूर्ण स्किल है। भाषा के अन्य कौशलों की तरह, यह कौशल भी रातों-रात विकसित नहीं हो सकता। निरंतर अभ्यास से इस कौशल को कायदे से विकसित किया जा सकता है। स्पष्ट बोलना, सही उच्चारण, प्रवाह, अवसर के अनुरूप शब्दों का चयन, ठहराव के साथ बोलना, महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जोर देना और उचित उतार-चढ़ाव के साथ बोलना अच्छे वाक् कौशल की निशानी है। मुख्यत: इंटरव्यू में काम आने वाला यह स्किल आपके परीक्षा परिणाम को काफी हद तक प्रभावित कर सकता है। यह भी न भूलें कि जिस तरह एक अच्छा पाठक ही एक अच्छा लेखक बन सकता है। उसी तरह एक अच्छा श्रोता ही एक अच्छा वक्ता बन सकता है।
आइए अब बात करते हैं, सिविल सेवा परीक्षा के नजरिए से विशेष महत्वपूर्ण दो कौशलों, पठन और लेखन की। प्रारम्भिक और मुख्य परीक्षा, दोनों के लिहाज से, पढ़ने और लिखने के स्किल को विकसित करने का कोई विकल्प नहीं है। पढ़ने के स्किल को अामतौर पर हम हल्के में ले लेते हैं। पर न भूलें कि प्रारम्भिक परीक्षा के दोनों प्रश्नपत्रों और मुख्य परीक्षा के नौ प्रश्नपत्रों में रीडिंग स्किल की जबर्दस्त भूमिका है। प्रिलिम्स में कम समय में अधिक प्रश्न पढ़ने और समझने के दबाव से पार पाना जरूरी है। अगर प्रिलिम्स में सुरक्षित स्कोर चाहिए, तो सीसैट के कॉम्प्रिहेंशन खंड में अच्छा प्रदर्शन करना ही होगा। साथ ही प्रथम प्रश्नपत्र के सवालों को समझने के लिए भी रीडिंग स्किल और भाषा पर अधिकार की जरूरत है।
उदाहरणत: हिंदी माध्यम के अभ्यर्थी प्राय यूपीएससी की परीक्षा में अनुवाद को लेकर चिंतित रहते हैं। यद्यपि इसमें कोई भी संदेह नहीं है कि अनेक बार शाब्दिक अनुवाद या क्लिष्ट अनुवाद के चलते अभिप्राय कहीं गुम हो जाता है, पर इस समस्या से पार पाने का एक विकल्प है हिंदी और यथासंभव अंग्रेजी भाषाओं पर ठीकठाक अधिकार। अगर आपका शब्दकोष बेहतर होगा, तो निश्चित तौर पर आप कॉम्प्रिहेंशन को अच्छे से हल कर पाएंगे।
मुख्य परीक्षा के दो अनिवार्य भाषा के प्रश्नपत्रों (हिंदी और अंग्रेजी) के साथ-साथ पढ़ने और लिखने के स्किल पर पकड़ होना, सभी नौ प्रश्नपत्रों में आपका प्रदर्शन बहुत हद तक प्रभावित कर सकता है। निबंध और एथिक्स के पेपर जिन्हें अब मुख्यपरीक्षा में गेम चेंजर माना जाता है। भाषा कौशलों पर अधिकार हासिल कर इनमें जबर्दस्त प्रदर्शन किया जा सकता है। यही स्थिति वैकल्पिक विषय और सामान्य अध्ययन पेपर प्रथम, द्वितीय और तृतीय के साथ भी है। उदाहरण के तौर पर अगर आपका भाषा पर अच्छा अधिकार है, तो आप :
1 भाषा के सही संदर्भ को समझ सकते हैं
2 की वर्ड्स का सही अभिप्राय समझकर प्रासंगिक उत्तर लिख सकते हैं। उदाहरण के तौर पर एथिक्स, राजव्यवस्था और अर्थव्यवस्था में।
3 भाषा की प्रयुक्तियों को समझना भी जरूरी होता है। अलग-अलग क्षेत्रों और संदर्भों में भाषा का अलग-अलग तरीके से प्रयोग किया जाता है। जैसे बाजार की भाषा, सिनेमा की भाषा, साहित्य की भाषा, अकादमिक जगत की भाषा, सरकारी काम-काज की भाषा आदि। भाषा की इन प्रयुक्तियों और संदर्भों को समझकर उसी अनुरूप बोलने और लिखने का प्रयास करना चाहिए।
4 यदि पढ़ने और लिखने का स्किल बेहतर है, तो पढ़ने और लिखने की स्पीड बढ़ाई जा सकती है। जो अभ्यर्थी तेज पढ़ते और लिखते हैं, वे निश्चित तौर पर दूसरों की तुलना में उम्दा प्रदर्शन कर पाते हैं। सामान्य अध्ययन में राइटिंग स्पीड का महत्व किसी से छिपा नहीं है।
पठन और लेखन के कौशल काे विकसित करने के लिए जरूरी है जनरल रीडिंग हैबिट। दरअसल, हम कुछ अच्छा और कुछ नया पढ़ने की आदत से दूर हो गए हैं और पाठ्यपुस्तकों से अलग फिक्शन, नॉन फिक्शन या कोई अच्छी पत्रिका पढ़ने की फुरसत नहीं निकाल पाते। अच्छा पढ़ने से समझ बढ़ती है , नजरिया व्यापक होता है और भाषा पर पकड़ मजबूत बनती है, सो अलग।
भाषा पर मजबूत अधिकार कॉम्प्रिहेंशन को तो बेहतर करता है, अभिव्यक्ति को भी राेचक और प्रभावी बनाता है। जैसे, यदि आपकी भाषा और उसके शब्दकोश पर अच्छा अधिकार है, तो आप सही अवसर पर सही शब्द, मुहावरे, कहावत या काव्य पंक्ति का प्रासंगिक प्रयाेग कर अभिव्यक्ति में चार चांद लगा सकते हैं। ठीक इसी तरह जब पढ़ने का सवाल हो, तो प्रश्नपत्र की जटिल और कई बार बोझिल भाषा को भी अच्छे से समझकर उस अनुरूप सटीक उत्तर दे सकते हैं। यदि आप यूपीएससी परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना चाहते हैं, तो भाषा के कौशल की अनदेखी न करें और खुद को प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त कर श्रेष्ठ स्थान प्राप्त करें।

Thursday, 15 September 2016

दिवाली की यादें ......

दिवाली की यादें ......

युवावस्था के इस पड़ाव पर जब मुड़कर बचपन की ओर देखता हूँ तो बचपन की खट्टी-मीठी यादों में दिवाली की यादें भुलाए नहीं भूलती। दिवाली के साथ ग़ज़ब के संयोग जुड़े हैं। 1986 की छोटी दिवाली को मेरठ के सरकारी अस्पताल में मैं जन्मा। मम्मी बताती हैं कि नर्स ने चुटकी लेते हुए कहा कि लो तुम्हारे राम पधारे हैं। 
ख़ैर, हर शहर का पुराना इलाक़ा उस शहर की संस्कृति और जीवंतता का प्रतीक होता है। पूरा बचपन और किशोरावस्था पुराने मेरठ शहर के गली-कूँचों और मुहल्लों में बीती। होली और दिवाली हम बच्चों के पसंदीदा त्यौहार थे। जिस तरह होली के आस-पास हमारे मुहल्ले से बिना रंगों में पुते निकलना नामुमकिन था, उसी तरह दिवाली पर भी गली में आगंतुकों का स्वागत पटाखों से किया जाता। अनार, चकरी, बिजली बम, रोक़िट और लड़ी, सबसे लोकप्रिय पटाखे थे। 

दिवाली का दूसरा महत्वपूर्ण एंगिल था - घर की सम्पूर्ण सफ़ाई। इस पुनीत कार्य में बच्चा पार्टी का भरपूर सहयोग लिया जाता। मुझे बख़ूबी याद है कि हम सारे पलंग बाहर निकलकर, छत और कमरों के कोने-कोने बुहारते। पलंग बाहर निकल जाने पर कमरा बड़ा-बड़ा दिखता और बच्चे ख़ूब धमाचौकड़ी मचाते।
दिवाली पर स्कूल में लगातार पाँच दिन छुट्टी होती थी। गरमी की छुट्टियों के बाद यही सबसे लम्बी छुट्टियाँ थी। मम्मी घर को संवारना और कम ख़र्चे में घर चलाना बख़ूबी जानती थीं। धनतेरस पर चाहे एक तश्तरी या चम्मच ही ख़रीदें पर ख़रीदती ज़रूर थीं। दिवाली पर पटाखे बहुत महँगे पड़ते थे पर हम बच्चे थोड़े में संतुष्ट हो जाते। थोड़ा और बड़े होकर समझ में आया कि पटाखे ख़रीदने से अच्छा है, छत पर जाकर आराम से आतिशबाज़ी निहारो। न हींग लगता न फ़िटकरी, और रंग भी चोखा होता। न आतिशबाज़ी में हाथ जलाने का जोखिम और न ही धेले भर का ख़र्चा। मुझे याद है कि हम बच्चे मिलकर घर के मुख्य द्वार पर रंगबिरंगी कंदील टाँगते थे, जिसका तार बहुत लम्बा होता था।  ख़ास बात यह थी कि चाहे कोई बाहर पढ़ता हो या नौकरी करता हो, दिवाली के दिन घर आना और दादी के हाथ की पंजीरी या लौकी की बर्फ़ी खाना लगभग अनिवार्य होता था। इस बार दिवाली पर अम्माजी की कमी तो बहुत खलेगी, पर हम उनके जीवट और जीवंतता से प्रेरणा लेकर ख़ूब मन से दिवाली मनाएँगे।
 जैन परिवारों में दिवाली भगवान महावीर का निर्वाण दिवस भी है। जब भगवान महावीर आठों कर्मों का नाश करने की ओर अग्रसर होकर गहन ध्यान में तल्लीन थे, तब उनके प्रमुख शिष्य (गणधर) इंद्रभूति गौतम स्वामी कैवल्य ज्ञानप्राप्ति की ओर अग्रसर थे। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन, यह अद्भुत संयोग बना, जब तीर्थंकर महावीर को निर्वाण प्राप्त हुआ और गौतम स्वामी को कैवल्य। इस संदर्भ में महावीर की एक बात उन्हें विशिष्ट बनाती है। उन्होंने अपने शिष्य से कभी अपना अनुकरण करने के लिए नहीं कहा। उनका मानना था कि प्रत्येक मानव रत्नत्रय- सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र के पथ पर चलकर अपने पुरुषार्थ से सिद्धत्व प्राप्त कर स्वयं भगवान बन सकता है। इस तरह भगवान महावीर प्राणियों से अपनी शरण में आने को नहीं कहते। वह प्रत्येक जीव को उसका अनंत बल और क्षमताएँ स्मरण कराकर प्रत्येक आत्मा के परमात्मा बन सकने की सम्भावना व्यक्त कर प्राणिमात्र की स्वतंत्रता की घोषणा करते हैं। महावीर ने यही उपदेश अपने सबसे निकट शिष्य इंद्रभूति गौतम को दिया और उन्हें कैवल्य का मार्ग दिखाया।

मुझे बख़ूबी याद है, दिवाली की पूर्व संध्या पर मंदिर में तीर्थंकर प्रतिमा के समक्ष जब पूरा परिवार घी के दिये जलाने जाता और दिवाली की अलसुबह चार-पाँच बजे सब मिलकर जैन मंदिर में निर्वाण लड्डू या श्रीफल अर्पित करते। दिवाली की रात को घर पर पूजा तो होती ही थी। जैन समुदाय दिवाली पर तीर्थंकर भगवान के कैवल्य ज्ञान रूपी लक्ष्मी की उपासना करता है। साथ ही पूजा में 'निर्वाण काण्ड' का पाठ होता। निर्वाण काण्ड उन सभी सिद्धों की स्तुति है, जिन्होंने आत्मसाधना द्वारा मोक्ष प्राप्त किया। जैन दर्शन की यह विशेषता है कि यह किसी भी व्यक्ति विशेष की पूजा पर बल न देकर गुणों की पूजा करता है। यही कारण है कि जैन धर्म का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण मंत्र 'नमोकार मंत्र' भगवान महावीर या किसी अन्य तीर्थंकर की उपासना न करके कैवल्य प्राप्त करने वाले सभी अरिहंतों व सिद्धों और सभी साधुओं को नमस्कार करता है। 
ज्ञान और तप-त्याग-संयम को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के कारण ही जैन लोग दिवाली का उत्सव तो मनाते हैं, पर धर्माराधना और सादगी के साथ। 

क्या हैं पर्यूषण, क्षमावाणी और दशलक्षण.....

क्या हैं पर्यूषण, क्षमावाणी और दशलक्षण.....

आज-कल आप अख़बार और सोशल मीडिया पर 'पर्यूषण पर्व', 'क्षमावाणी पर्व','दशलक्षण पर्व' और 'सम्वत्सरी' के बारे में पढ़-देख रहे होंगे। लोग साल भर की ग़लतियों और भूलों के लिए एक-दूसरे से क्षमा माँग रहे हैं तो कुछ लोग व्रत-तप-संयम में लीन होकर आत्मसाधना में जुटे हैं। आइए जानते हैं- क्या है जैन समाज के इन पर्वों का मतलब:-
सावन के बाद आने वाला भादों (भाद्रपद) का महीना जैन धर्म के अनुयायियों के लिए बेहद पवित्र है। जैन समुदाय के दोनों सम्प्रदायों- दिगंबर और श्वेतांबर, के लिए यह पूरा माह आत्मशुद्धि और सार्वभौम क्षमा को समर्पित है। भादों के महीने का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्व है- पर्यूषण, जो श्वेतांबर जैनों के लिए आठ और दिगम्बर जैनों के लिए दस दिनों का होता है। पर्यूषण का अर्थ है- ख़ुद के निकट आना। पर्यूषण पर्व तप-त्याग-संयम और क्षमा का पर्व है। ज़्यादातर लोग उपवास के माध्यम से तप-साधना करते हैं।
श्वेतांबर जैन समुदाय के लिए पर्यूषण पर्व आठ दिनों का होता है, जिसका अंत सम्वत्सरी पर होता है। सम्वत्सरी के अगले दिन दिगम्बर जैनों के दस दिन के पर्यूषण शुरू होते हैं। इन दस दिनों में धर्म के दस लक्षणों की आराधना के कारण दिगम्बर लोग इसे 'दशलक्षण पर्व' के नाम से भी जानते हैं। धर्म के दस लक्षण हैं- क्षमा, मार्दव (मान का अभाव), आर्जव (छल-कपट से दूर रहना), शौच(पवित्रता), सत्य, संयम, तप, त्याग, अकिंचन (सहजता और परिग्रह से दूर रहना) और ब्रह्मचर्य (सदाचार)। दिगम्बर जैन समुदाय के दस दिन चलने वाले पर्यूषण का समापन 'अनंत चतुर्दशी' और फिर 'क्षमावाणी' के साथ होता है। अनंत चतुर्दशी पर लोग साल भर के व्रतों का पारायण करते हैं। दिगम्बर समाज के लोग इस दिन नगर में तीर्थंकर भगवान की रथयात्रा भी निकालते हैं।


'सम्वत्सरी' और 'क्षमावाणी' क्षमा के दिन हैं। मेरी समझ में दुनिया के किसी भी धर्म-समुदाय में क्षमा का कोई त्यौहार नहीं है, इस तरह यह एक अनूठा पर्व है। घर-परिवार से लेकर समाज तक, सब एक-दूसरे से माफ़ी माँगते हैं और दूसरों को सहर्ष माफ़ करते भी हैं। 'सबसे क्षमा-सबको क्षमा' इस पर्व का मूलमंत्र है। सब प्राकृत भाषा में 'मिच्छामी दुक्कड़म' कहकर एक-दूसरे से हृदय से क्षमा माँगते हैं। जैनों को क्षमा का विस्तार मनुष्य तक ही नहीं प्राणीमात्र तक है-


"खामेमि सव्व जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे,
मिती मे सव्व भुए सू, वैरम मज्झ न केवई।"
(प्राकृत)

"I grant forgiveness to all, May all living beings grant me forgiveness.
My friendship is with all living beings, My enemy is totally non-existent."

(English Translation)

--निशान्त जैन 

मेरे लिए शिक्षक दिवस के मायने....

मेरे लिए शिक्षक दिवस के मायने....
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आज मैं जो कुछ भी हूँ, या ज़िंदगी में मैंने जो कुछ भी अच्छा किया है, उसमें मेरे शिक्षकों की बहुत बड़ी भूमिका है। नर्सरी की क्लास टीचर निर्मला दीदी ( हम मैम को दीदी कहते थे) का मातृवत वात्सल्य आज भी यादों में ताज़ा है। मेरी माँ बताती हैं, कि एक बार स्कूल जाने के बाद, मैंने फिर कभी स्कूल जाने में आना-कानी नहीं की। इसका बड़ा कारण मेरे शिक्षक और स्कूल का आत्मीय माहौल था। माँ एक और मज़े की बात बताती हैं। अगर घर पर कभी माँ पढ़ाती, तो मैं अक्सर उसे यह कहकर ख़ारिज कर देता, कि स्कूल में दीदी ने यह नहीं बताया या उन्होंने जो बताया है, वही ठीक है। फिर माँ ने स्कूल की टीचर को यह बात बतायी। जब टीचर ने मुझे समझाया कि घर वाले जो पढ़ाते हैं, वह भी ठीक होता है, तब जाकर तो मैंने माँ का पढ़ाया हुआ सही मानना शुरू किया।

छठी क्लास की एक ओर मज़ेदार बात मैं कभी नहीं भूलता। हमारे स्कूल में परीक्षा के नतीजे आने के बाद अभिभावकों को उत्तर पुस्तिका दिखायी जाती थी। मेरी माँ मेरी कापी देखने पहुँची। क्लास टीचर श्री रामदर्शन जी जमकर मेरी प्रशंसा कर रहे थे। पर माँ तो माँ ठहरी, कहने लगीं कि मेरा बेटा घर पर ग़ुस्सा बहुत करता है। क्लास टीचर मुस्कुराए और बोले, "बहन जी, दूधारू गाय की तो लात भी सहनी पड़ती है।"

स्कूल में एक शिक्षक थे -संदीप जी। वे हम सबको बड़े भाई जैसे लगते। पढ़ाई के अलावा भी ढेर सारी उलझनें हम उनसे खुलकर साझा करते। गणित और विज्ञान का डर उन्होंने ही हमारे मन से निकाला। किसी विषय में हमारी रुचि उस विषय के शिक्षक के व्यवहार, स्वभाव और पढ़ाने के तरीक़े पर भी काफ़ी हद तक निर्भर होती थी। संदीप जी कठिन माने जाने वाले विषयों को हँसते-मुस्कुराते पढ़ाते और हम भी हँसते-मुस्कुराते सीखते जाते।

माध्यमिक स्तर पर वाणिज्य के शिक्षक थे-राजकुमार सर। मैंने अपनी अभी तक की ज़िंदगी में इतनी सरलता, विनम्रता और सहजता बहुत कम लोगों में देखी है। कठिन विषय की समस्याएँ घर पर बुलाकर भी समझा देते।

मेरठ कालिज के शिक्षकों को भी मैं कभी नहीं भूलता। विशेषकर तत्कालीन प्राचार्य डॉ एस के अग्रवाल और हिंदी विभाग के शिक्षक डॉ रामयज्ञ मौर्य। प्रिन्सिपल सर जैसे कर्मठ और सहृदय व्यक्ति आसानी से नहीं मिलते। सकारात्मक मोटिवेशन देना तो कोई उनसे सीखे। जब मैं और मेरा साथी विवेक डिबेट में पहला पुरस्कार और शील्ड जीतकर लौटे, तो पूरे स्टाफ को अपनी जेब से जलेबी खिलाकर प्रिन्सिपल साहब ने हमारा उत्साह कई गुना बढ़ा दिया था।

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के शिक्षकों से जीवन और सोच के आयामों का विस्तार करने की सीख मिलती। साहित्य-आलोचना जगत के बड़े-बड़े दिग्गजों का सान्निध्य मिलना भावभूमि, चेतना और संवेदना का विस्तार करता है। डॉ राजेंद्र गौतम, प्रो अपूर्वानंद, प्रो गोपेश्वर सिंह, प्रो हरिमोहन शर्मा, प्रो पूरनचंद टंडन जैसे शिक्षकों का व्यक्तित्व स्वयं में अभिप्रेरणा का स्त्रोत है। धवल जैसवाल और मिहिर पण्ड्या जैसे सीनियर्स से भी बहुत कुछ सीखा। हिंदी साहित्य के विविध आयामों को सीखने में डॉ विकास दिव्यकीर्ति का योगदान भुलाया नहीं जा सकता।  

ख़ैर, मुझे ऐसा लगता है कि शिक्षक सब कुछ देकर हमसे कुछ नहीं माँगते। हमें उन्हें सिर्फ़ थोड़ा सा सम्मान ही तो देना होता है, पर अक्सर वो भी हम नहीं दे पाते।
कुछ लोगों को यह भी लगता है कि शिक्षक दिवस साल में एक दिन ही क्यों मनायें, रोज़ ही शिक्षकों का सम्मान करना चाहिए। बात बिलकुल ठीक हैं। पर मुझे लगता है, कि अगर एक दिन शिक्षक दिवस जे बहाने ही सही, रस्म अदायगी के बहाने ही सही, यदि हम अपने शिक्षकों को मन से याद कर लें, दूर होने के कारण मिल न सकें तो फ़ोन ही कर लें और उनके योगदान के प्रति कृतज्ञता महसूस कर लें, तो इतना भी काफ़ी है।
देर से ही सही, सभी शिक्षकों और शिष्यों को शिक्षक दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएँ!!!!
सीखते रहें और सिखाते रहें।

सिविल सेवा परीक्षा में हिंदी की सम्भावनाएँ....

संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा (आई.ए.एस./आई.पी.एस/ आई.एफ.एस. आदि) और राज्य लोक सेवा आयोगों की सिविल सेवा परीक्षा (पी.सी.एस.) भारत की बेहद प्रतिष्ठित लेकिन कठिन मानी जाने वाली परीक्षाएं हैं। सिविल सेवा परीक्षा में सफलता हासिल करना, हिंदी पट्टी के किसी भी युवा का सपना हो सकता है। हिंदी भाषी राज्यों के ऐसे हज़ारों-लाखों युवक-युवतियां हैं, जो हिंदी माध्यम लेकर इस परीक्षा का तिलिस्म तोड़ना चाहते हैं।
सिविल सेवा परीक्षा में हिंदी की राह थोड़ी कठिन ज़रूर हो सकती है, पर असम्भव नहीं। अप-टू-डेट अध्ययन सामग्री की कमी और प्रोफ़ेशनल एप्रोच का अभाव हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। लेकिन अगर हिंदी वाले स्मार्ट एप्रोच अपनाएं और हिंदी में उपलब्ध प्रामाणिक स्टडी मैटेरियल की पहचान कर उसका भरपूर इस्तेमाल कर लें, तो इस समस्या से निजात पायी जा सकती है। साथ ही सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ें, तो सफलता की सम्भावनाएं कई गुना बढ़ सकती हैं।
आने वाले दिनों में सिविल सेवा परीक्षा में हिंदी माध्यम की सम्भावनाएं काफी उज्ज्वल हैं। 2014 की सिविल सेवा परीक्षा में सौभाग्य से मुझे 13वीं रैंक और हिंदी माध्यम में पहला स्थान मिला था। 2015 में भी हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों ने 62वीं और 99वीं रैंक हासिल की है। हिंदी माध्यम वाले अपनी मेहनत और दृढ़ निश्चय से अपनी राह बना रहे हैं और आगे भी बनाते रहेंगे। आप बस 'अपनी लकीर बड़ी करें'।
अंग्रेज़ी कोई हौव्वा नहीं है। अंग्रेज़ी पर कामचलाऊ पकड़ बना लें, क्योंकि मुख्य परीक्षा में अंग्रेज़ी का क्वालिफ़ाइंग पेपर पास करना होता है। दूसरा, अगर आप अंग्रेज़ी में सहज हैं, तो अंग्रेज़ी में उपलब्ध अच्छे ऑनलाइन मैटीरियल तक भी आप अपनी पहुंच बना सकते हैं। निबंध, एथिक्स और वैकल्पिक विषय के पेपर पर अपनी पकड़ बनाएं, ताकि अंग्रेज़ी माध्यम के अभ्यर्थियों के मुक़ाबले प्रतियोगिता में टिक सकें। वैकल्पिक विषय ऐसा चुनें, जिसमें हिंदी में मैटीरियल और मार्गदर्शन उपलब्ध हो। आजकल हिंदी में भी अच्छी अध्ययन सामग्री की कमी नहीं है। तमाम सरकारी प्रकाशन, जैसे एनसीईआरटी की किताबें, योजना, कुरुक्षेत्र जैसी पत्रिकाए, रेडियो, टीवी और सरकारी वेबसाइटें हिंदी में उपलब्ध हैं। बड़े और मशहूर लेखकों की किताबों के हिंदी अनुवाद भी उपलब्ध हैं। जैसे पोलिटी के लिए एम लक्ष्मीकान्त और हिस्ट्री के लिए स्पेक्ट्रम। लेखन कौशल पर विशेष ध्यान दें और उत्तर लिखने का नियमित अभ्यास करें। प्रीलिम्स के लिए पिछले सालों के प्रश्नपत्र और टेस्ट सीरीज़ का अभ्यास करते रहें।
हिंदी माध्यम के सिविल सेवा अभ्यर्थियों पर, ग़ज़ल सम्राट दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां सटीक बैठती हैं-
इस नदी की धार से, ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है,
एक चिंगारी कहीं से, ढूँढ लाओ ए दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।

--निशान्त जैन, आई.ए.एस, रैंक 13, UPSC-2014 (हिंदी माध्यम में सर्वोच्च स्थान)